
जिस दिन हमने ये तय किया था कि शिक्षा का एकमात्र मक़सद नौकरी पाना होगा, उस दिन हमने अपनी बर्बादी का सामान तैयार कर लिया था। आज के तथाकथित उच्च शिक्षित लोगों को जब हम मूर्खतापूर्ण भरी बातें करते देखते हैं, किसी भी उल-जुलूल ऐतिहासिक तथ्य पर यकीन करते देखते हैं, सामान्य विवेक को धता बताते हुए अंधविश्वास की डगर पकड़ते देखते हैं तो ये सब उसी फैसले के दुष्परिणाम है जब हमने शिक्षा का मक़सद सिर्फ़ और सिर्फ़ नौकरी बनाया था।

हमने कभी कोशिश नहीं की कि हम बच्चों के भीतर वो समझ डालें जो उन्हें वैज्ञानिक रूप से सोचने पर मजबूर करे। वैज्ञानिक रूप से सोच यानी वैज्ञानिक चिंतन, ये सिर्फ विज्ञान पढ़ने से नहीं उपजता है। अपने आसपास देख लीजिये, दर्जनों मिल जायेंगे जिन्होंने विज्ञान की औपचारिक पढ़ाई की है, लेकिन ज्योतिषी के हाथों में अपना हाथ थमाए अपने कल को जानने की उम्मीद कर रहे होते हैं। विज्ञान पढ़ने वाले भी ये सोचते हैं कि करोड़ों मील दूर हवा में लटका एक विशाल ग्रह हमारे जीवन को प्रभावित कर सकता है।
उनका कोई दोष नहीं, ये हमारी शिक्षा व्यवस्था की खामी है।
ग्यारहवीं में आर्ट्स लेने वालों को तो हमारे यहाँ गधा माना जाता है। होनहार बच्चा अगर इतिहास या दर्शन जैसे विषय ले लेगा वो मुंह दिखाने के काबिल नहीं रहेगा। पढ़ाई से भागने वाला भी अगर विज्ञान ले लेगा तो उसे अक्लमंद माना जाएगा।
तकनीक आधारित विषय लेकर जो लोग पैसा कमा रहे हैं, एक बार उनकी सामाजिक, राजनैतिक और ऐतिहासिक समझ पर नज़र डालेंगे तो पायेंगे कि निन्यानवें फ़ीसदी विशुद्ध अज्ञानी हैं।
शिक्षा को सही मायने में परिभाषित नहीं किया। किसी भी तरह की डिग्री अर्जित करने को शिक्षित होना मान लिया गया।
“हर बच्चा ख़ास होता है, फिर हम उसे स्कूल भेजते हैं ताकि वो आम बन सके।”